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how to prevent stroke: आज वर्ल्ड स्ट्रोक डे (World Stroke Day) है. स्ट्रोक (Stroke) किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है. आजकल के बदलते लाइफस्टाइल और स्ट्रेस की वजह से 30 से 50 साल तक के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. स्ट्रोक के लक्षणों को समझकर तुरंत सही इलाज किया जाना कई जिंदगियों को बचा सकता है. दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल (Sir Ganga Ram Hospital) में कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट (Neurologist) डॉ अनुराधा बतरा (Dr Anuradha Batra) ने ब्रेन स्ट्रोक को लेकर कुछ अहम बातें बताई हैं. जिन्हें जानना आपके लिए बेहद जरूरी है. क्योंकि स्ट्रोक के समय जरा भी लापरवाही से मरीज की लाइफ खतरे में पड़ सकती है. डॉ अनुराधा के अनुसार, ब्रेन अटैक (Brain Attack) यानी स्ट्रोक (Stroke) एक ऐसी इमरजेंसी सिचुएशन है जिसमें ब्रेन में ब्लड सप्लाई बाधित हो जाती है. या फिर दिमाग के अंदर कोई रक्त नलिका यानी ब्लड वेसल (blood vessel) फट जाती है. इन दोनों ही सिचुएशन में ब्रेन तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है. इसका नतीजा यह होता है कि दिमाग के क्रियाकलाप संचालित नहीं हो पाते हैं. ब्रेन की किसी नस के डैमेज होने से पीड़ित व्यक्ति को उस अंग विशेष का लकवा-पक्षाघात यानी पैरालिसिस (Paralysis) भी मार सकता है. जैसे ब्रेन में अगर पैर को संचालित करने वाली नस डैमेज हो जाती है, तो पैर लकवाग्रस्त हो सकते हैं. इसी तरह हाथ भी लकवाग्रस्त हो सकता है.

आजकल ये देखने में आ रहा है कि यंग और मीडियम एज के लोगों में स्ट्रोक का रिस्क बढ़ रहा है.  डॉक्टर अनुराधा के अनुसार, इसका सबसे बड़ा कारण ऐसी एज के लोगों द्वारा हेल्दी लाइफस्टाइल को फोलो ना करना है. स्ट्रोक का खतरा कुछ लापरवाहियों की वजह से भी बढ़ता है. जैसे देर से सोने, देर से जागने, रेगुलर एक्सरसाइज ना करने, टाइम पर खाना ना खाने और खाने के नाम पर फास्टफूड या जंक फूड खाने और कई तरह के नशे की लत. यंग और मीडियम एज के लोगों में बढ़ता स्ट्रेस भी दिल और दिमाग की हेल्थ पर बैड इफैक्ट डाल रहा है.

‘BE FAST’ से लक्षण पहचाने

डॉक्टर अनुराधा का मानना है कि समय रहते (स्ट्रोक आने के 4 घंटे के अंदर-अंदर) अगर मरीज को अच्छे अस्पताल में दाखिल करा दिया जाए, तो जान बच सकती है. यही वजह है कि स्ट्रोक्स के लक्षणों की पहचान होना जरूरी है. इसका सबसे अहम तरीका है ‘BE FAST’ इसे कुछ इस तरह से समझा जा सकता है.

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B- बैलेंस (Balance)- स्ट्रोक पीड़ित व्यक्ति अपने शरीर पर बैलेंस खो देता है. वो ना सही तरीके से बैठ पाता है और ना ही खड़ा हो पाता है
E-आईज (Eyes)- अगर स्ट्रोक से पीड़ित व्यक्ति को एक आंख या दोनों आंखों से अचानक धुंधला दिखाई देने लगे या दिखाई ही ना दे, तो समझ लें कि ये स्थिति स्ट्रोक से जुड़ी हो सकती है.
F-फेस (Face)- स्ट्रोक में फेस यानी चेहरा एक तरफ मुड़ जाता है. इसमे व्यक्ति मुस्कुरा भी नहीं पाता है या ऐसा होता है कि फेस सीधा नहीं दिखता.
A-आर्म्स (Arms)- स्ट्रोक में बांहे यानी बाजू शिथिल यानी ढ़ीले (Loose) हो जाते हैं, और उन्हें ऊपर उठाने में दिक्कत होती है. साधारण भाषा में कहें तो उनमें जान नहीं रहती है.
S-स्पीक (Speak)- स्ट्रोक में पीड़ित को बोलने में परेशानी होती है, उसकी जुबान लड़खड़ाने लगती है.
T-टाइम (Time)- स्ट्रोक में सबसे अहम है टाइम. स्ट्रोक होने पर टाइम बर्बाद ना करते हुए मरीज को तुरंत ही अस्पताल पहुंचाएं, जहां तक हो सके अच्छी सुविधाओं वाले अस्पताल में ही ले जाएं. जहां एमआरआई, सीटी स्कैन और बेहतर आईसीयू की सुविधा हो.

सावधानियों से टल सकता है खतरा

– ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखें, हाई बीपी स्ट्रोक का रिस्क बढ़ा देता है. डॉक्टर से कंसल्ट करते रहें
– कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखें, इसका बढ़ा हुआ लेवल हाई बीपी की आशंकाओं को बढ़ा देता है.
– ब्लड शुगर कंट्रोल में रखें, डायबिटीज वाले व्यक्ति खान-पान का परहेज रखें. समय पर दवा लें.
– मोटापे से बचने के लिए नियमित एक्सरसाइज करें, हरी-भरी सब्जियां और फल खाएं
– परिवार में अगर किसी को पहले से ये समस्या रही है, तो सब सावधानी बरतें, डॉक्टरी सलाह लें.
– स्मोकिंग और दूसरी तरह के नशे से बचें

गोल्डन आवर
स्ट्रोक (Stroke) की शुरुआती जांचों में सीटी स्कैन (CT Scan) और ब्लड टेस्ट किया जाता है. डॉक्टर एमआरआई और ब्रेन की एंजियोग्राफी (angiography) भी करा सकते हैं. स्ट्रोक के बाद लगभग साढ़े 4 घंटे के वक्त को गोल्डन आवर (Golden Hour) कहते हैं. इस दौरान मरीज को एक विशेष इंजेक्शन लगाने पर काफी हद तक सुधार हो जाता है. इसे कॉमन लैंग्वेज में ‘क्लॉट बस्टर (Clot Buster)’ भी कहते हैं.

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डॉ अनुराधा के मुताबिक, इसके अलावा एमआरआई के कुछ सॉफ्टवेयर भी हैं. जो हमें ये जानने में मदद करते हैं कि क्लॉट कितना पुराना है. उसके आधार पर हम आगे क्लॉट निकलाने के प्रोसीजर्स कर सकते हैं. पहले तो हमारी कोशिश रहती है कि मरीजों को साढ़े चार घंटे में ही क्लॉट बस्टर दिया जाए, लेकिन अगर फिर भी देर हो जाती है तो इन सॉफ्टवेयर से हम पता लगाकर आगे का इलाज शुरू करते हैं.

स्ट्रोक का इलाज

एंजियोग्राफी (Angiography)
इसमें ब्रेन की धमनियों (arteries) की एंजियोग्राफी की जाती है. जिसे इंटरवेंशनल न्यूरो रेडियोलॉजी (Interventional Neuro Radiology) कहा जाता है. ये एंजियोग्राफी एक प्रकार की तकनीक है, इससे बेहतर तरीके से दिखाई दे जाता है कि ब्लॉकेज कहां पर है. इसी से आप इस ब्लॉकेज को निकालने के प्रयास कर पाते हैं.

एंजियोप्लास्टी (Angioplasty)
एंजियोप्लास्टी में मॉडर्न स्टेंट (Stent) के जरिए ब्रेन में जमा हुए छोटे-छोटे ब्लड क्लॉट यानी खून के थक्कों और ब्लॉकेज को दूर किया जा सकता है. पर ये हर केस में लागू नहीं होती है और इसकी उपलब्धता भी हर जगह नही हैं. वहीं इसे हर ऐज के व्यक्ति को भी नहीं दिया जा सकता है.

स्पेशल सॉफ्टवेयर (special software)
मॉडर्न सुपर कंप्यूटर में एक स्पेशल सॉफ्टवेयर की हेल्प से ये जानकर कि ब्रेन के कितनी क्षति पहुंच चुकी है और कितना डैमेज हम बचा सकते हैं, इसका पता चल जाता है. स्ट्रोक में प्रिवेंशन बहुत जरूरी है, अगर प्रिवेंशन कर लेंगे, तो ब्रेन सेव होगा. इसलिए एमआरआई की स्पेशल तकनीक (सॉफ्टवेयर) डीपीएम यानी डिफ्यूजन-पर्फ्यूजन-मिसमैच (diffusion-perfusion mismatch) से एक्चुअल सिचुएशन का पता किया जाता है. फिर इलाज शुरू होता है. इसकी मदद से देर से अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को भी फायदा मिल सकता है.

फिजियोथेरेपी
स्ट्रोक के बाद जिनके अंग ढंग से काम नहीं कर पाते, उनके लिए फिजियोथेरेपी की मदद ली जाती है. उन्हें मांसपेशियों व जोड़ों की एक्सरसाइज कराई जाती है. इसके अलावा स्पीच थेरेपी से भी राहत मिलती है. जो अंग बेकार हो गए उन्हें वापस एक्टिव करने के लिए फिर से ब्रेन को स्टिम्युलेट करें.

स्ट्रोक के प्रकार

इस्केमिक स्ट्रोक (ischemic stroke)
इस प्रकार के स्ट्रोक में ब्रेन को ब्लड की सप्लाई करने वाली ब्लड वेसल क्लॉटिंग की वजह से संकुचित या अवरुद्ध हो जाती है. ब्रेन की धमनियों की अंदरूनी दीवार में फैट जमने से ब्लड के थक्के बनते हैं. ये सबसे कॉमन स्ट्रोक है. इस स्थिति में दिमाग में ब्लड की पर्याप्त सप्लाई नहीं हो पाती है, जिससे ब्रेन की कार्यप्रणाली ठप हो जाती है.

ट्रांजियंट इस्केमिक स्ट्रोक (transient ischemic stroke)
जब ब्रेन को ब्लड वेसल के जरिए ब्लड की समुचित मात्रा में सप्लाई नहीं हो पाती है, जो उस स्थिति को ट्रांजियंट इस्केमिस्क स्ट्रोक कहते हैं. अनेक लोगों में स्ट्रोक के कुछ लक्षण महसूस होते हैं, पर ये लक्षण अपने आप एक दो दिन में दूर हो जाते हैं. जैसे हाथ पैर में कमजोरी होना, स्पीच में प्रोब्लम होना, फेस तिरछा होता है या बैलेंस बिगड़ता है. इन्हें पहचानना बहुत जरूरी है. ये स्थिति ट्रांजियंट इस्केमिक स्ट्रोक (TIS) के मामलों में सबसे ज्यादा होती है. टीआईएस चेतावनी देता कि आप जल्दी ही न्यूरो स्पेशलिस्ट से एडवाइज लें.

हैमोरेजिक स्ट्रोक (Hemorrhagic stroke)
हैमोरेजिक स्ट्रोक को ब्रेन हैमरेज (Brain Hemorrhage) भी कहते हैं. ब्रेन हैमरेज, स्ट्रोक का ही एक प्रकार है. ब्रेन हैमरेज गंभीर मेडिकल स्थिति है. जिसमें दिमाग की ब्लड वेसल फट जाती है. ये सिचुएशन गंभीर पैरालेसिस का प्रमुख कारण है. हाई बीपी में हैमोरेजिक स्ट्रोक के मामले ज्यादा होते हैं. ब्रेन की धमनियां फट जाती है. ब्रेन के अंदर ही फट जाती है.

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