Stubborn Behaviour of Children- Is your no could be the reason of your kids stubborn Behaviour? Know what experts say
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Stubborn Behaviour of Children- Is your no could be the reason of your kids stubborn Behaviour? Know what experts say

Stubborn Behaviour of Children: कोरोना काल में कई पैरेंट्स (Parents) बच्चों के बाहर खेलने या जाने को लेकर हमेशा चिंता में रहते हैं लेकिन बच्चे तो बच्चे हैं, उन्हें भी कब तक बहलाया जा सकता है? आखिर वो भी घर में रहकर चिड़चिड़े या जिद्दी होने लगे हैं. जानकारों का मानना है कि पैरेंट्स का बात-बात में बच्चों को न कहना भी उनके जिद्दी बनने का कारण हो सकता है. ऐसे में एक्सपर्ट्स का मानना है कि आपको समझदारी और संयम के साथ बच्चों से डील करने की जरूरत होती है. किसी चीज को लेकर डिमांड करना बच्चों की आदत होती है. ऐसे में उसे हां कहें या न दोनों ही मामलों में बच्चे का व्यवहार जिद्दी हो सकता है. एनबीटी की रिपोर्ट में पैरेंटिग एक्सपर्ट डॉ. गीतांजली शर्मा बताती हैं कि पैरेंट्स को कोशिश करनी होगी कि वे न शब्द का कम से कम इस्तेमाल करें क्योंकि किसी तरह के नकारात्मक शब्द या बात बोलने से बच्चे पर उसका नेगिटिव असर पड़ता है.

डॉ. गीतांजली के अनुसार, वैसे तो बच्चे की हर बात मानना संभव नहीं है लेकिन इसके लिए माता- पिता को धैर्य से काम लेने की जरूरत है. बच्चे को समझने की कोशिश करें, जानें कि वो क्या चाहता है और उस पर अपनी किसी चीज को कराने के लिए दबाव न बनाएं.

‘No’ को कैसे करें न?
अब सबसे बड़ा सवाल है कि ‘न यानी No’ को कम से कम प्रयोग में कैसे लाया जाए, ताकि बच्चे को ये न लगे कि पैरेंट्स उनकी बात को नहीं समझते. अपनी स्टेट्समेंट्स को आप पॉजिटिव बनाएं और न का कम से कम प्रयोग करें. डॉ. गीतांजली के मुताबिक, मान लीजिए आपका बच्चा खेल रहा है और अभी पढ़ना नहीं चाहता है, तो सीधा तरीका तो ये है कि आप कहें कि खेलना बंद करो. दूसरा तरीका ये है कि बेटा पहले आप पढ़ लो, फिर खेल लेना, तो दोनों बातों में फर्क है. एक में आपने सीधे मना कर दिया जो बच्चे को पसंद नहीं आएगा. दूसरा, जिसमें आपने पढ़ाई के साथ-साथ उसे खेल की इजाजत भी दे दी.

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इसके अलावा आप बच्चों से नेगोशिएट भी कर सकते हैं. जैसे बच्चा कह रहा है कि उसे 10 बजे नहीं 12 बजे सोना है तो आप उससे कह सकते है कि न आपकी न मेरी, चलो आप 10.30 बजे सो जाना. है. इससे बच्चे को लगेगा कि उसकी भी बात मानी जा रही है.

डॉ गीतांजली के अनुसार, कई बार बच्चों को शिकायत रहती है कि पैरेंट्स उनसे नौकर की तरह व्यवहार करते हैं. ये गलत है, आप ऑथोरिटी हैं तो भी आपको बच्चों को सम्मान देना होगा. वहीं घर में माता-पिता के बीच भी बहसबाजी जैसी चीजें नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये सब देखतक बच्चा भी आपके जैसा ही व्यवहार करेगा.

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बच्चा जब गुस्से में हो तो ये ना करें
कई बार ये देखने में आया है कि बच्चे के गुस्से में होने पर माता पिता भी उस पर गुस्सा करने लगते हैं, उसे डांटने लगते हैं. जबकि ऐसे समय में उन्हें धैर्य से काम लेना चाहिए. दिल्ली के बालाजी एक्शन अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ डॉ आशीष साहनी बताते हैं, बच्चा जब गुस्से में हो तो कतई भी उससे कोई बहस न करें, ऐसे में आप उससे कोई भी बात करेंगे, तो उसका कोई फायदा नहीं होगा. जब वो शांत हो, तब उससे ये जानने की कोशिश करें कि वो क्या सोचता है.

अगर बच्चा टीनेजर (Teenager) है तो क्या उसपर स्कूल या दोस्तों की तरफ से कोई दबाव है? वहीं अगर बच्चा छोटा है, तो उसकी हर बात को मान लेना भी सही नहीं है. यहां आपको दोनों ही मामलों में पहले बच्चे की प्रॉब्लम को समझना है. फिर उस समस्या को कैसे दूर किया जा सकता है ये सोचना है. अगर बच्चा रोज चॉकलेट खाने की जिद्द करता है, तो उसे डांटे या मारे नहीं, आप कह सकते हैं कि उसे चॉकलेट मिल जाएगी लेकिन पहले होमवर्क करना है. तो बच्चे को समझने के लिए खुद को बदलें.

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