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Health news world epilepsy day know the difference between seizure and epilepsy and their treatment dlpg

नई दिल्‍ली. आज अंतरराष्‍ट्रीय मिरगी दिवस (World Epilepsy Day) है. मिरगी एक ऐसी बीमारी है जो भारत के ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्‍यादा पाई जाती है. छोटे-छोटे बच्‍चों से लेकर बड़ों में दौरे पड़ने की यह बीमारी कभी कभी तो इतनी बढ़ जाती है क‍ि इसका इलाज जीवनभर करवाया जाता है लेक‍िन मरीज पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता. यहां तक क‍ि मिरगी (Epilepsy) का मरीज दिव्‍यांग की श्रेणी में आ जाता है. हालांक‍ि क‍िसी भी व्‍यक्ति को पड़ने वाले दौरे को मिरगी नहीं कहा जा सकता. कभी कभी ऐसा भी होता है क‍ि मरीज को पड़ने वाला दौरा (Seizure) सिर्फ दौरा होता है, मिरगी नहीं होती. विशेषज्ञों की मानें तो मिरगी और दौरा पड़ना दो अलग-2 बीमारियां हैं. मिरगी और दौरे में एक बारीक अंतर है, जिसे समझना बेहद जरूरी है. यहां इस खबर में जानें कौन सा ज्‍यादा खतरनाक है और क‍िसका इलाज क‍ितना लंबा चलता है ?

ऑल इंडिया इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में डिपार्टमेंट ऑफ न्‍यूरोलॉजी में प्रोफसर डॉ. मंजरी त्रिपाठी बताती हैं क‍ि दौरे दो प्रकार के हो सकते हैं. एक होता है एक्‍यूट सिम्‍टोमैटिक सीजर. इसका मतलब है कि ब्रेन (Brain) में कोई भी बीमारी 24 घंटे के अंदर-अंदर आए. किसी को अगर सिर में चोट लगती है या स्‍ट्रोक की परेशानी है तो 24 घंटे के अंदर- अंदर दौरा हो सकता है. वहीं अगर शरीर में सोडियम, कैल्शियम, खून में शुगर या अन्‍य किसी तत्‍व की कमी हो जाए तो भी दौरा हो सकता है. ध्‍यान देने वाली बात है कि ये मिरगी नहीं है. ये एक्‍यूट सिम्‍टोमैटिक सीजर है. इन्हें प्रोवोक सीजर भी कहते हैं. जहां तक इलाज की बात है तो इनमें लंबी दवा नहीं देनी पड़ती है. एक या दो हफ्ते तक दवा देने के बाद दवा बंद कर दी जाती है क्‍योंकि इसमें सिर्फ उस बीमारी का इलाज किया जाता है, जिसकी वजह से ये बीमारी हो रही है. ऐसे में देखा गया है कि छोटे इलाज के बाद दौरे की समस्‍या खत्‍म हो जाती है. कई बार ऐसा देखा गया है क‍ि कोई व्‍यक्ति ज्‍यादा शराब पी लेता है तो भी उसे दौरे आने लगते हैं. ये भी प्रोवोक सीजर ही होते हैं.

ये होती है मिरगी, बच्‍चों में होती है आम 

मिरगी एक अलग बीमारी है. यह क्रॉनिक बीमारी है. जैसे अस्‍थमा, डायबिटीज, आर्थराइटिस या ब्‍लड प्रेशर की समस्‍या होती है, ऐसे ही मिरगी होती है. इसके एपिसोडिक मेनिफेस्‍टेशन हैं. मिरगी में दो या दो से ज्‍यादा दौरे पड़ते हैं. ये इसलिए पड़ते हैं क‍ि पांच साल पहले, 10 साल पहले या पैदाइश के समय ब्रेन या मस्तिष्‍क में कुछ दिक्‍कत या घात हुआ हो. मिरगी के बहुत सारे कारण हो सकते हैं. मान लीजिए क‍ि कोई बच्‍चा पैदा होने वाला है लेक‍िन उसकी पैदाइश में देरी हो रही है. या फिर समय से उसे निकाला नहीं जा सका. या फिर समय से निकाला तो गया लेक‍िन बाहर आने के दौरान उसकी ऑक्‍सीजन कम हो गई. बच्‍चा नीला पड़ जाता है और उसे हाइपॉक्‍सिया होता है. या नवजात शिशु को हाइपोग्‍लेसिमिया भी होता है तो बच्‍चा तो बड़ा हो रहा है लेक‍िन 6 साल की उम्र में उसे दो या दो बार से ज्‍यादा दौरा पड़ता है तो उसको मिरगी बोलते हैं.

ब्रेन पर आघात या घात तो पहले हुआ था लेक‍िन बीमारी बाद में आती है. वैसे ही अगर आज क‍िसी को 50 साल की उम्र में लकवा हुआ और होकर खत्‍म हो गया लेक‍िन चार साल बाद दौरे आएं. तो ऐसी स्थिति में ब्रेन में डैमेज होने के कारण इसे मिरगी कहा जाता है. रिमोट सिम्‍टोमैटिक कारण के कारण इसे मिरगी बोला जाएगा. इसमें पहले ब्रेन में चोट लगती है उसके कई साल बाद इसके असर के रूप में दौरे पड़ते हैं. वैसे ही क‍िसी हेड इंजरी या सिर में चोट लगी तो इसके दो या चार या 6 साल बाद दौरे आ गए तो इसको पोस्‍टट्रॉमेटिक एपिलेप्‍सी बोला जाएगा. इसके अलावा ब्रेन में कोई सिकुड़न हो या जेनेटिक कारण हो उसकी वजह से भी दौरे आते हैं. ब्रेन में खून की नलियां बढ़ी हुई हों, तब भी दौरे आते हैं और बार-बार आते हैं. ये बिना इलाज के ठीक नहीं होते.

मिरगी और दौरे में ये है खतरनाक, इतना लंबा चलता है इलाज
डॉ. मंजरी कहती हैं क‍ि मिरगी और दौरों में अंतर करना बहुत जरूरी है. ये कोई न्‍यूरोलॉजिस्‍ट ही करता है या फिर एमरजेंसी में देख रहे डॉक्‍टर करते हैं. दौरों या एक्‍यूट सिम्‍टोमैटिक सीजर में दवा दो हफ्ता या ज्‍यादा से ज्‍यादा 4 हफ्ता दी जाती है. जबक‍ि मिरगी में कम से कम दो साल या ज्‍यादा से ज्‍यादा जीवनभर भी इलाज लेने की जरूरत पड़ती है. दौरे क‍िसी बीमारी के कारण पैदा होते हैं और जल्‍दी ठीक हो जाते हैं लेक‍िन मिरगी पैदाइशी या अन्‍य कारण से हो सकती है और इलाज काफी लंबा चल सकता है. हालांक‍ि यह कारण पर निर्भर होता है. कभी कभी ऐसा भी होता क‍ि ब्रेन अंदर से सामान्‍य है फिर भी मिरगी होती है. कई मिरगी हैं जिनमें ब्रेन का एमआरआई सामान्‍य पाया गया है.

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