साइंटिस्टों ने बनाया ब्रेन नेटवर्क का मैप, सुलझेंगे ब्रेन के कामकाज के तौर-तरीकों से जुड़े रहस्य
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साइंटिस्टों ने बनाया ब्रेन नेटवर्क का मैप, सुलझेंगे ब्रेन के कामकाज के तौर-तरीकों से जुड़े रहस्य

हमारा ब्रेन कैसे काम करता है? ये आज भी कई मामलों में साइंटिस्टों के लिए पहेली बना हुआ है. इसकी गुत्थी सुलझाने के लिए लगातार कोशिश जारी हैं. इसी फेहरिस्त में फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट (Francis Crick Institute) के रिसर्चर्स ने एक ऐसी इमेजिंग टेक्नोलॉजी विकसित की है, जो सब-सेलुलर (उप-कोशिकीय) लेवल पर ब्रेन के टिशूज के आकार और कार्य के बारे में जानकारी इकट्ठा कर सकती है. सब-सेलुलर लेवल का मतलब एक मीटर के एक अरबवां हिस्से (Billionths of a metre) से है. इतना ही नहीं, इससे सेल्स के इर्द-गिर्द के वातावरण की भी जानकारी मिलती है. इस तकनीक के जरिये विभिन्न पैमाने पर टिशूज की इमेजिंग हो सकेगी, जिससे साइंटिस्ट सेल्स के कामकाज और उसके आसपास के एरिया को देख सकेंगे और ब्रेन के न्यूरल नेटवर्क की एक पूरी तस्वीर भी बना सकेंगे.

बता दें कि टिशूज, सेल्स और सब-सेल्स के लेवल पर जानकारी जुटाने के लिए कई तरह की इमेजिंग की जाती है. लेकिन इससे किसी एक तरीके से टिशूज के स्ट्रक्चर या कामकाज के बारे में ही सूचनाएं इकट्ठी की जा सकती हैं. ऐसे में नैनोमीटर के स्केल पर उनके आसपास की सूचनाएं नहीं मिल पाती है. इसका मतलब है कि यदि टिशूज के बारे में संपूर्ण जानकारी हासिल करनी है, तो इमेजिंग तकनीक को ज्वाइंट करने की जरूरत है. इस स्टडी का निष्कर्ष नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

इस तकनीक में क्या है खास
साइंटिस्टों ने अपनी स्टडी में इसके लिए 7 इमेजिंग मेथड को ज्वाइंट किया, जिनमें वीवो इमेजिंग, सिंक्रोट्रान एक्स-रे और वाल्यूम इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी भी शामिल है. इसके जरिये रिसर्चर्स ने चूहे के ब्रेन के दो हिस्से- ओल्फेक्ट्री बल्ब (Olfactory Bulb) और हिप्पोकैंपस (Hippocampus) यानी मेमोरी पावर से जुड़े ब्रेन के हिस्से की इमेजिंग की. खास बात ये है कि इस तकनीक का इस्तेमाल ब्रेन के अन्य हिस्से या शरीर के अन्य हिस्से के लिए भी किया जा सकता है, जिससे विभिन्न बायोलॉजिकल स्ट्रक्चर्स और टिशूज के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है. इस तरह के इमेजिंग प्रोसेस में हर फेज में अलग-अलग जानकारी मिलती है.

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कैसे हुई स्टडी 
रिसर्चर्स ने ब्रेन के खास क्षेत्र में न्यूरॉन को देखने के लिए सबसे पहले वीवो कैल्शियम इमेजिंग का इस्तेमाल किया. इससे ये जानकारी जुटाई गई कि किसी स्मेल के इफैक्ट में चूहे के ब्रेन में कौन सा न्यूरॉन एक्टिव हुआ. चूहे की मौत के बाद भी सिंकोट्रान एक्स-रे टोमोग्राफी समेत अन्य तरीकों से उसकी इमेजिंग से सैंपल टिशूज की मिलीमीटर तक की जानकारी जुटाई गई. इस स्केल पर जुटाई जानकारी से पूरे न्यूरल नेटवर्क के बारे में जाना जा सकता है. साथ ही किसी खास सेल्स या अन्य संरचना को व्यापक तौर पर विश्लेषित किया जा सकता है. खास बात ये है कि इस मेथड के इस्तेमाल से सैंपल को कोई नुकसान नहीं होता है, इसलिए अन्य तकनीक के जरिये भी उसकी इमेजिंग की जा सकती है.

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स्टडी में क्या निकला
रिसर्चर्स ने उसके बाद हाई रेजोल्यूशन में अंदरूनी विवरण हासिल करने के लिए ब्रेन के सलेक्टेड पार्ट्स की इमेजिंग के लिए इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी का इस्तेमाल किया. कुछ टारगेट एरियाज में 10 नैनोमीटर तक के विवरण हासिल किए जा सके. इससे रिसर्चर्स को न्यूरॉन कप्लिंग की फाइन स्ट्रक्चरिंग भी देखने को मिली. कंप्यूटर अल्गोरिद्म के इस्तेमाल से रिसर्चर्स ने इन सभी नतीजों को मिलाकर ब्रेन के लक्षित हिस्से का एक पूरा मैप तैयार किया, जो क्यूबिक मिलीमीटर लेवल तक का था. रिसर्चर्स ने बताया कि ये एक विश्वसनीय पद्धति (Reliable method) है, जिससे विभिन्न स्केलों पर स्ट्रकर्स की इमेजिंग में आने वाली चुनौतियों से पार पाया जा सकता है. ट्यूमर सेल्स  की एक्टिविटीज की भी जानकारी मिलेगी.

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