वाय आकार की एंटीबॉडी.
स्वास्थ्य

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी क्या होती है और वैक्सीन के साथ इसकी ज़रूरत क्यों है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) को जब कोरोना वायरस संक्रमण (Corona Infection) पाया गया तो जो इलाज उन्हें दिया गया, उसमें मोनोक्लोनल एंटीबॉडी की एक प्रायोगिक मिक्स थेरैपी भी थी. अब चूंकि खबरें हैं कि वैक्सीन (Anti Corona Vaccine) तकरीबन तैयार हो चुकी है और जल्द ही लोगों के लिए उपलब्ध हो सकती है, तो क्या सवाल खड़ा होता है कि क्या दूसरे इलाज (Covid-19 Treatments) बेकार हो जाएंगे? और यह मोनोक्लोनल एंटीबॉडी क्या है और इसकी ज़रूरत कितनी बनी रहेगी?

Covid-19 के इलाज में मोनोक्लोनल एंटीबॉडी अस्ल में पुख्ता थेरैपी के तौर पर सामने आई, जिससे कोरोना वायरस बेअसर हो जाता है. यह थेरैपी वायरस को इस तरह बेअसर कर देती है कि वो कोशिकाओं को संक्रमित नहीं कर पाता. जिन लोगों के शरीर में कुदरती तौर पर इम्युनिटी मज़बूत नहीं है, खासकर उनके लिए यह थेरैपी किसी वरदान से कम नहीं मानी जा रही. आइए इसे समझते हैं.

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कैसे बनती हैं मोनोक्लोनल एंटीबॉडी?इन्हें बनाना ज़रा टेढ़ी खीर है. हैम्स्टर (एक किस्म का चूहा) के अंडाशय के भीतर की कोशिकाओं में एक खास प्रयोग के दौरान बन सकने वाली ये एंटीबॉडी एक तो महंगी बहुत रही है और दूसरे प्यूरीफाई प्रक्रिया में बहुत समय लेती हैं. एक फार्मा कंपनी रेजनेरॉन की दो एंटीबॉडी SARS-CoV-2 के प्रोटीन को निशाना बनाती हैं. इनमें से एक तो उस एंटीबॉडी की क्लोन है, जो कोविड के रिकवर हुए मरीज़ों के भीतर विकसित हो चुकी होती हैं.

जब एंटीबॉडी (सफेद) वायरस की सतह को कवर करते स्पाइक प्रोटीन को बांधता है, तो कोरोना वायरस कोशिकाओं को संक्रमित नहीं कर पाता.

दूसरी एंटीबॉडी वो है जो चूहों में पाई जाती है और मनुष्यों के इम्यून सिस्टम के लिए खास तौर पर बायोलॉजिकली इंजीनियर की गई. जब चूहे को स्पाइक प्रोटीन का इंजेक्शन दिया गया, तब इस एंटीबॉडी की अहमियत मनुष्यों के लिए समझ आई. जो सबसे असरदार एंटीबॉडी चूहे के शरीर में थी, उसे निकालकर इस थेरैपी में इस्तेमाल किया गया.

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अब आलम यह है कि दो प्रमुख फार्मा कंपनियां बड़े पैमाने पर मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का उत्पादन कर रही हैं और इसकी सप्लाई के सिस्टम को भी मज़बूत कर रही हैं. इस एंटीबॉडी के एक ब्रांड एलि लिली का अमेरिका में एफडीए से मंज़ूरी मिल चुकी है. अब जानने की बात यह है कि वैक्सीन आने के बाद इस थेरैपी की कोई ज़रूरत बचेगी.

वैक्सीन के साथ मोनोक्लोनल एंटीबॉडी!
कोरोना संक्रमण के सिलसिले में विशेषज्ञों की राय है कि वैक्सीन के साथ इस थेरैपी के इस्तेमाल से ज़्यादा फायदा होगा. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दिए जाने से मरीज़ को तत्काल सुरक्षा मिलती है, जो कुछ हफ्तों से लेकर महीनों तक फायदेमंद साबित हो सकती है. दूसरी तरफ, वैक्सीन शरीर के इम्यून सिस्टम को मज़बूत करने में काफी समय ले सकती है. लेकिन खूबी यह है कि एक बार असर होने पर वैक्सीन से लंबे समय तक सुरक्षा मिलती है.

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हाई रिस्क वाली आबादी या फिर ज़रूरी होने पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ तय कर सकते हैं कि अगर किसी मरीज़ को फौरन इम्युनिटी सुरक्षा की ज़रूरत हो तो यह एंटीबॉडी थेरैपी वैक्सीन आने के बाद भी कारगर होगी. यह थेरैपी ने केवल इलाज बल्कि संक्रमण को रोकने के लिहाज़ से भी अहम बताई गई है. बूढ़ों, बच्चों और कमज़ोर इम्युनिटी वाले लोगों पर वैक्सीन बेअसर साबित हुई तो इस थेरैपी की अहमियत बनी रहेगी.



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