ज्यादा बॉडी फैट सोचने-समझने की क्षमता को करता है प्रभावित- स्टडी
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ज्यादा बॉडी फैट सोचने-समझने की क्षमता को करता है प्रभावित- स्टडी

Body fat is a risk for cognitive function : शरीर में ज्यादा फैट (FAT) यानी चर्बी होना अपने आप में कई बीमारियों की दस्तक के बराबर है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये फैट आपके दिमाग के लिए भी परेशानी का सबब बन सकता है? एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि अगर ज्यादा बॉडी फैट होने से सोचने और याददाश्त से जुड़े कामों में दिक्कत होती है. ये परेशानी खासतौर पर वयस्कों में होती है, जिनमें सूचनाओं की प्रोसेसिंग की स्पीड कम हो जाती है. रिसर्चर्स ने कार्डियोवस्कुलर रिस्क के कारकों (जैसे डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर) या वस्कुलर ब्रेन इंजरी को लेकर स्टडी की तो पाया कि बॉडी फैट यानी शरीर की चर्बी और कम संज्ञानात्मक स्कोर (cognitive score) के बीच गठजोड़ा का संबंध कायम दिखा. इससे संकेत मिलता है कि ज्यादा बॉडी फैट और कम संज्ञानात्मक स्तर का कोई दूसरा तथ्य सामने नहीं आया है.

इस स्टडी का निष्कर्ष जेएएमए नेटवर्क ओपन (JAMA Open Network) में प्रकाशित किया गया है. इस स्टडी के तहत 9166 पार्टिसिपेंट्स (सहभागियों) के कुल बॉडी फैट के आकलन के लिए बायोइलेक्ट्रिकल रिएक्शन (Bioelectrical reaction) का विश्लेषण किया गया. इसके साथ ही 6733 सहभागियों का मैग्नेट रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) जांच से पेट की चर्बी (वसरल फैट) और वस्कुलर ब्रेन इंजरी का भी पता लगाया गया, जहां ब्लड की सप्लाई कम हो रही थी.

कैसे हुई स्टडी 
स्टडी में शामिल गए लोगों की उम्र 30 से 75 साल और औसत उम्र करीब 58 साल थी. इनमें से 56 प्रतिशत सहभागी कनाडा और पोलैंड की महिलाएं थीं. सहभागियों में ज्यादातर यूरोपीय मूल के श्वेत थे और 16 प्रतिशत अन्य जातीय बैकग्राउंड के थे. इनमें कार्डियोवस्कुलर डिजीज से ग्रस्त लोगों को बाहर रखा गया है.

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क्या कहते हैं जानकार
मैक मास्टर यूनिवर्सिटी के माइकल जी डी-ग्रूटे स्कूल ऑफ मेडिसिन की प्रोफेसर और इस स्टडी की प्रमुख राइटर प्रोफेसर सोनिया आनंद (Sonia Anand) का कहना है, ‘हमारी स्टडी के अनुसार, बॉडी फैट के जरूरत से ज्यादा बढ़ने को कम करने या उसकी रोकथाम की रणनीति संज्ञानात्मक फंक्शन को संरक्षित कर सकती है.’

उन्होंने आगे बताया कि शरीर में बढ़ी हुई चर्बी का प्रभाव डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसे कार्डियोवस्कुलर रिस्क के लिए समायोजित किए जाने के बाद भी बना रहता है. इसलिए रिसर्चर्स को ये भी पता लगाना चाहिए कि ऐसी कौन सी अन्य क्रियविधि है, जो ज्यादा चर्बी से जुड़े कम संज्ञानात्मक फंक्शन को लिंक करता है.

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इस स्टडी की को-राइटर और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगैरी (University of Calgary) में क्लिनिकल न्यूरोसाइंसेज के एसोसिएट प्रोफेसर इरिक स्मिथ (Eric Smith) का कहना है कि संज्ञानात्मक फंक्शन को संरक्षित करना बुढ़ापे में डिमेंशिया की रोकथाम का सबलसे बढ़िया उपाय हो सकता है. मतलब ये कि अच्छा पोषण और फिजिकल एक्टिविटी से वजन और बॉडी फैट की मात्रा को उपयुक्त बनाए रखने के साथ ही बुढ़ापे में आशंकित डिमेंशिया के खतरे को भी कम कर सकते हैं.

Tags: Health, Health News, Lifestyle

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