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जानिए क्या है ‘चैलेंज ट्रायल’, जिसकी पुरज़ोर वकालत कर रहे हैं नोबेल विजेता | america – News in Hindi

दुनिया भर में Covid-19 के खिलाफ 23 संभावित वैक्सीनों के Human Trial जारी हैं, ऐसे में वैज्ञानिकों के एक समूह ने अमेरिकी स्वास्थ्य संस्थानों को खुली चिट्ठी लिखते हुए कहा है कि ‘चैलेंज ट्रायल’ से ही वैक्सीन के विकास में तेज़ी आ सकती है. दूसरी तरफ, Oxford यूनिवर्सिटी और एस्ट्राज़ेनेका (AZN.L) द्वारा विकसित वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल का तीसरे फेज़ ब्राज़ील में शुरू हो गया है, जहां 2000 वॉलेंटियर इसमें हिस्सा ले रहे हैं.

अस्ल में, वैक्सीन के डेवलपरों और शोधकर्ताओं को ऐसे स्थान खोजने पड़ रहे हैं, जहां कोरोना वायरस संक्रमण ज़्यादा हैं. चूंकि क्लीनिकल ट्रायल के एडवांस चरणों में कई लोगों की ज़रूरत होती है इसलिए विशेषज्ञ अपील कर रहे हैं कि स्वस्थ लोग वैक्सीन ट्रायल में हिस्सा लें. इन विशेषज्ञों में कई नोबेल विजेता भी शामिल हैं, जो चैलेंज ट्रायल की बात कह रहे हैं.

क्या होता है चैलेंज ट्रायल?
लैब में संभावित वैक्सीन की टेस्टिंग और शुरूआती ट्रायलों के बाद वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में बड़े पैमाने पर लोगों को टीका देकर उसका असर जाना जाता है. टीका देने के बाद लोगों को सामान्य रूप से जीने के लिए और बगैर प्रोटेक्शन लिये संक्रमण के खतरों के सामने रहने को कहा जाता है ताकि पता चल सके कि वैक्सीन असरदार है कि नहीं. इस परीक्षण के लिए वॉलेंटियरों को प्रोत्साहित करने की प्रक्रिया को ह्यूमन चैलेंज ट्रायल (HCT) कहते हैं.ये भी पढ़ें :- क्या सोशल मीडिया पर किसी का भी अकाउंट हैक हो सकता है?

दुनिया भर में करीब 23 संभावित वैक्सीनों के क्लीनिकल ट्रायल जारी हैं.

इन्फ्लुएंज़ा, मलेरिया, टायफाइड, डेंगू और हैज़ा जैसी महामारियों के लिए पहले भी इस तरह के चैलेंज ट्रायल हो चुके हैं और फिलहाल कोरोना वायरस के खिलाफ बन रही वैक्सीनों को परखने के लिए चैलेंज ट्रायल के लिए विशेषज्ञ पुरज़ोर वकालत कर रहे हैं.

क्या हो सकता है HCT का असर?

वर्तमान हालात में यह कहना मुश्किल है कि कोविड 19 से दुनिया की कुल कितनी आबादी संक्रमित होगी और किस रफ्तार से. विशेषज्ञ मान रहे हैं क जब तक एक कारगर वैक्सीन नहीं होगी, लोग इस वायरस से संक्रमित होते ही रहेंगे. एक कारगर वैक्सीन से कितना फायदा होगा, यह कहना फिलहाल जल्दबाज़ी हो सकती है लेकिन “1 डे सूनर” ने एक आंकलन किया है.

मान लिया जाए कि हर साल कोविड 19 की चपेट में दुनिया की एक बटे छह आबादी आएगी तो अगर कोई वैक्सीन से लोगों की मौत की दर 0.2% भी टल सके, तो वैक्सीन डेवलपमेंट की रफ्तार से कितना फायदा होगा :

*1 दिन में 7120 जीवन बचेंगे
*1 हफ्ते में 55,000 जानें बचेंगी
*1 महीने में 220,000 जीवन और
*3 महीने में 5 लाख से ज़्यादा जानें बच सकती हैं.

तो क्या HCT ही है इकलौता तरीका?
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि स्वस्थ वॉलेंटियरों को वैक्सीन देने के बाद उन्हें दैनिक जीवन में कोरोना वायरस के सामने खड़ा रहने दिया जाए और उन पर संक्रमण संबंधी अध्ययन किए जाएं. यही इकलौता तरीका है, जिससे वैक्सीन के विकास में तेज़ी आ सकती है क्योंकि ऐसे ही अध्ययनों से वैज्ञानिक वायरस के प्रभाव और मरीज़ के इलाज के बारे में ज़्यादा जान सकेंगे.

कई देशों में संक्रमण के हालात को देखते हुए कई तरह की स्टडी की जा रही हैं इसलिए संभव है कि वैज्ञानिक अगले साल तक किसी नतीजे पर पहुंच सकें लेकिन 15 नोबेल विजेता विद्वानों सहित 100 प्रमुख विशेषज्ञों को शामिल करने वाली संस्था 1 Day Sooner के मुताबिक चैलेंज ट्रायल का सही समय है और यह करना ही होगा.

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चैलेंज ट्रायल को लेकर वैज्ञानिकों ने कहा कि ये कदम उठाना ही होगा.

तो क्या वॉलेंटियरों को होंगे खतरे?
कोविड 19 को लेकर दुनिया भर के डेटा में पाया गया कि जहां स्वास्थ्य सुविधाएं बदतर थीं और कोरोना वायरस का प्रभावी स्ट्रेन था, वहां मौतें ज़्यादा हुईं. दूसरी तरफ, ये भी देखा गया कि ज़्यादा उम्र और पहले से गंभीर रोगों से ग्रस्त मरीज़ों में संक्रमण के कारण मौतें ज़्यादा हुईं. ऐसे में वैक्सीन ट्रायल के दौरान वॉलेंटियरों में बीमारी का खतरा माना जा रहा है, लेकिन मौतों का खतरा न के बराबर होगा, ये दावा भी किया जा रहा है.

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विशेषज्ञों के मुताबिक चैलेंज ट्रायल के लिए स्वस्थ और युवा आबादी को चुनने से वॉलेंटियरों के सामने खतरे कम से कम होंगे. साथ ही, इस ट्रायल में वैक्सीन के बावजूद अगर कोई प्रतिभागी वायरस से संक्रमित होता है, तो उसे फौरन आइसोलेट कर उसके इलाज के लिए पूरी व्यवस्था होगी.

और एक पहलू ये भी है कि इस तरह के ट्रायल में हिस्सा लेना एक तरह से मानवता की सेवा करने जैसा है. करीब 20 लाख कोविड संक्रमितों वाले देश ब्राज़ील में चल रहे ट्रायल में कई लोग इसी भावना से शामिल हुए. विशेषज्ञों ने कहा है कि ट्रायलों में शामिल होने वाले ‘वॉलेंटियरों के लिए खतरा बहुत कम होगा, लेकिन समाज के लिए इससे फायदा बहुत बड़ा होगा’.



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