क्यों मास्क पहनने से अब तक कतराते दिखे ज़्यादातर ग्लोबल नेता?
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क्यों मास्क पहनने से अब तक कतराते दिखे ज़्यादातर ग्लोबल नेता? | rest-of-world – News in Hindi

US President डोनाल्ड ट्रंप को Covid-19 के दौर में पहली बार Face-Mask पहने देखा गया, जब वो सैन्य अस्पताल पहुंचे. इससे पहले ट्रंप मास्क को गैर ज़रूरी बताते रहे थे. America में लंबे समय से यह बहस का मुद्दा रहा ​कि मास्क पहनना ज़रूरी है भी या नहीं क्योंकि Health Experts भले हिदायत दें लेकिन देश के शीर्ष नेता कतराते रहे. इसी तरह, यूरोप में भी नेताओं को मास्क से कतराते देखा गया. इसके पीछे कोई मानसिकता तो होगी या कोई मजबूरी या कोई संदेश..!

कुछ ही समय पहले तक कोविड 19 महामारी के Hot Spot रहे England में फिलहाल सिर्फ पब्लिक ट्रांसपोर्ट और अस्पतालों में ही मास्क पहनना अनिवार्य है, बाकी जगहों पर नहीं. लेकिन प्रधानमंत्री Boris Johnson भी हाल में एक दुकान पर मास्क पहने देखे गए. क्या ये जानना दिलचस्प नहीं है कि अब तक दुनिया के ये बड़े नेता क्यों मास्क से दूरी बनाए हुए थे और अब क्यों मास्क पहन रहे हैं?

मास्क से बचने के पीछे है पूरा मनोविज्ञान
एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक और ग्लोबल हेल्थ विशेषज्ञ डॉ क्लॉडिया पैग्लिएरी की मानें तो ऐसी कोई स्टडी नहीं हुई है कि राजनीतिक मास्क से बचने को लेकर क्या सोचते हैं, लेकिन ये ज़रूर कुछ कारणों से लिया गया फैसला होता है. डॉ क्लॉडिया ने राजनेताओं के मास्क न पहनने के पीछे कुछ कारणों पर ​विचार किया है.ये भी पढें:- जुर्म और सियासत का तालमेल: देश में किस कदर भयानक हैं हालात?

ताज़ा खबरों के मुताबिक ट्रंप मास्क पहने दिखाई दिए.

1. चूंकि इस महामारी को लेकर मौतों का अनुपात कम रहा और शुरू में इसे लेकर विज्ञान के आधार पर ज़्यादा मालूमात नहीं हो सकी इसलिए कई राजनेताओं ने यह संदेश ​देना चाहा कि यह महामारी सेहत के लिए कोई बहुत बड़ा खतरा नहीं है.
2. यह मास्क को व्यक्तिगत तौर पर उपयोगी न समझना हो सकता है. जैसे अमेरिकी स्वास्थ्य संस्था सीडीसी ने लोगों को मास्क पहनने की हिदायत दी तो ट्रंप ने कहा था कि यह ठीक है लेकिन निजी तौर पर उन्हें इसकी ज़रूरत महसूस नहीं होती.
3. एक कारण यह भी हो सकता है कि राजनेता यह ज़ाहिर करना चाहते हैं कि पोज़ीशन के चलते उन्हें जिस तरह का सुरक्षा कवच हासिल है, इससे उन्हें मास्क पहनने की ज़रूरत नहीं है.

4. कुछ नेता इसलिए भी मास्क पहनने से कतराते रहे हैं क्योंकि वो स्थापित चेहरे नहीं है और लोगों के बीच अपने चेहरे की पहचान बनाना चाहते हैं. उदाहरण के तौर पर ​बीते दिनों ऋषि सुनक ने एक होटल में वेटर की तरह बर्ताव करने के दौरान मास्क नहीं पहना.

ईगो, मर्दानगी और अर्थव्यवस्था के एंगल
अस्ल में, कई ग्लोबल नेताओं ने यह माना कि अगर वो महामारी से डरे हुए दिखेंगे तो ये उनके देश की अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगा. लोग इन्वेस्ट करने और व्यापार को बढ़ावा देने में हिचकेंगे. मास्क न पहनने के पीछे डॉ क्लॉडिया ईगो और मर्दानगी के पहलू का भी ज़िक्र करती हैं और ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो का उदाहरण आता है, जो पिछले दिनों ही कोरोना पॉज़िटिव पाए गए. बोल्सोनारो ने ऐसी ही मानसिकता के चलते न सिर्फ मास्क बल्कि महामारी तक का मज़ाक उड़ाया था.

नेताओं की कोताही का नतीजा?
लोग अपने चुने हुए या शीर्ष पदों पर बैठे राजनेताओं को फॉलो करते हैं और उनकी बातों व व्यवहार से प्रभावित व प्रेरित होते हैं इसलिए नेताओं को अपने निजी फैसले भी सोच समझकर लेने होते हैं. जब ये वैश्विक नेता विज्ञान के प्रति संदेह, स्वास्थ्य संबंधी विश्व स्तर की संस्थाओं की हिदायतों के प्रति नकारात्मक रवैया और निजी धारणाओं के लिए तरजीह वाला नज़रिया दिखाते हैं तो आम लोगों तक संदेश गलत ढंग से पहुंचता है.

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प्रशासन के लिए कानून और नियमों का सख्ती से पालन करवाना बड़ी चुनौती बन जाता है. नेताओं के इस नकारात्मक बर्ताव से लोगों में स्थितियों और वैज्ञानिक नज़रिये को लेकर साफ और सही तस्वीर नहीं बन पाती. कुल मिलाकर एक संदेहों और गलतफहमियों व मनमानियों की स्थिति बनी रहती है.

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ब्राज़ीली राष्ट्रपति बोल्सोनारो पिछले दिनों कोरोना पॉज़िटिव पाए गए.

क्या हैं मास्क के पीछे वैज्ञानिक सबूत
इंग्लैंड में विज्ञान की राष्ट्रीय संस्था रॉयल सोसायटी की एक रिपोर्ट में पाया गया कि दुनिया के 71 देशों में सार्वजनिक स्थानों पर मास्क पहनना ज़रूरी है जबकि करीब 15 देशों में हर जगह. लेकिन यूके इनमें शामिल नहीं है. ये भी कहा गया कि लोग घर से मास्क लेकर निकलें ताकि भीड़भाड़ वाली जगह पर पहुंचते ही पहन सकें.

दूसरी तरफ, पिछले ही दिनों अध्ययनों में पाया गया कि कोरोना वायरस एयरबोर्न है इसलिए मास्क पहनना और भी ज़रूरी हो जाता है. मास्क पहनने से होने वाले बचाव के संबंध में एक स्टडी भी हुई थी, जिसके बारे में न्यूज़18 ने आपको विस्तार से बताया था. इससे पहले भी दुनिया भर की स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं मास्क को संक्रमण से बचाव का मुख्य हथियार मानती रही हैं.

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क्या मास्क पहनने पर होना चाहिए बहस?
कई विशेषज्ञ यहां तक कह चुके हैं कि महामारी के दौर के बाद भी मास्क और स्वास्थ्य संबंधी साफ सफाई की कुछ हिदायतें ‘नयी सामान्य स्थिति’ होगी. इसके बावजूद मास्क पहनने को लेकर एक विवाद या नकार की धारणा को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मेलिंडा मिल्स अजीब और निराशाजनक मानती हैं.

अस्ल में, हाथ धोने या सोशल डिस्टेंसिंग जैसी हिदायतों का पालन करने में इतनी कोताही नहीं है, जितनी मास्क पहनने को लेकर है. मिल्स मानती हैं चूंकि मास्क आपके चेहरे यानी रंग रूप को छुपाता है, यानी आपके व्यक्तित्व के पूरे प्रभाव को रोकता है इसलिए भी लोग इससे हिचकते हैं. दूसरे WHO जैसी संस्थाएं मास्क पहनने को लेकर समय समय पर निर्देश बदलती रहीं इसलिए भी एक कन्फ्यूज़न की स्थिति बनी.



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