कोविड-19 और एचआईवी-एड्स दोनों ही वायरल बीमारियां हैं
स्वास्थ्य

कोविड-19 से HIV-एड्स के मरीज भी हो रहे प्रभावित, जानिए कैसे

World AIDS Day 2020: हर साल 1 दिसंबर को दुनिया भर में वर्ल्ड एड्स डे (World AIDS Day) मनाया जाता है और इसका मकसद ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस (HIV) और अक्वायर्ड इम्यूनोडिफिशिएंसी सिंड्रोम (AIDS) के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना है. सबसे पहले हम आपको बता दें कि एचआईवी एक वायरल इंफेक्शन है जिसमें फ्लू जैसे लक्षण- बुखार, गला खराब, गले में दर्द और थकान नजर आते हैं. धीरे-धीरे यह इंफेक्शन एड्स की तरफ बढ़ने लगता है जिसके लक्षण और ज्यादा गंभीर हो जाते हैं जैसे- अचानक वजन कम होना और बार-बार इंफेक्शन होना.

एचआईवी-एड्स एक जानलेवा बीमारी है और मौजूदा समय में इसका कोई इलाज नहीं है. यही वजह है कि समय पर इस बीमारी का पता लगाना और एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) की मदद से सही इलाज करवाना जरूरी है ताकि एचआईवी को कंट्रोल करने के साथ ही बढ़ने से भी रोका जा सके. अंतरराष्ट्रीय संस्थान जैसे- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), जॉइंट यूनाइटेड नेशन्स प्रोग्राम ऑन एचआईवी-एड्स (UNAIDS), हर देश की सरकारें, स्वास्थ्य एजेंसियां और नॉन-प्रॉफिट संस्थाएं कई सालों से लगातार दुनियाभर में काम कर रही हैं ताकि एचआईवी-एड्स के बारे में जागरूकता फैलायी जा सके, रिसर्च की जा सके और बीमारी का हल खोजा जा सके.

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UNAIDS के मुताबिक मौजूदा समय में दुनिया भर में करीब 3 करोड़, 80 लाख लोग ऐसे हैं जो एचआईवी-एड्स से पीड़ित हैं. इनमें से 3 करोड़, 62 लाख वयस्क मरीज हैं, जबकी बाकी के 18 लाख मरीज 15 साल से कम उम्र के बच्चे हैं. WHO के आंकड़ों की मानें तो 24 देशों के करीब 83 लाख लोगों को एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) मिल पाता है. हालांकि कोविड-19 महामारी जब से शुरू हुई है तभी से एचआईवी-एड्स के साथ जीने वाले मरीजों के लिए चलाए जाने वाले इन वैश्विक कैम्पेन और उन तक पहुंचने वाले प्रोग्राम्स में कमी देखने को मिली है. बावजूद इसके एचआईवी-एड्स खासकर एआरटी पर रिसर्च का प्रमुख फोकस है क्योंकि कोविड-19 और एचआईवी-एड्स दोनों ही वायरल बीमारियां हैं और दोनों को कंट्रोल करना एक ही तरह की दवा पर निर्भर कर सकता है।

यही कारण है कि अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का कहना है कि लोपिनाविर/रिटोनाविर जैसी कुछ एआरटी ने डारूनाविर और टेनोफोर डिसोप्रॉक्सिल फ्यूमरेट/एम्ट्रीसाइटाबिन को बढ़ावा दिया है और क्लिनिकल ट्रायल में उनका मूल्यांकन किया जा रहा है, यह देखने के लिए कि क्या यह दवाइयां गंभीर कोविड-19 के खिलाफ भी प्रभावी हैं या नहीं. हालांकि यहां पर ये याद रखना महत्वपूर्ण है कि मौजूदा समय में इन दवाओं को कोविड-19 मरीजों के इलाज में विकल्प के तौर पर दिए जाने की अनुमति नहीं दी गई है और इसकी अनुमति तब तक नहीं दी जाएगी जब तक क्लिनिकल ट्रायल में उनकी क्षमता और प्रभावकारिता साबित नहीं हो जाती. एआरटी पर पूरा फोकस होने के बावजूद एचआईवी-एड्स के मरीज लगातार इलाज मिलने की समस्या का सामना कर रहे हैं और उन्हें खुद भी कोविड-19 होने का खतरा है जिसकी वजह से उनकी स्थिति और भी कठिन हो गई है.

एचआईवी-एड्स के मरीजों को कोविड-19 का खतरा

जर्नल ऑफ वायरस इरैडिकेशन में नवंबर 2020 में भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित स्टडी में सुझाव दिया गया है कि चूंकि एचआईवी और कोविड-19 दोनों ही वायरल इंफेक्शन हैं. लिहाजा एचआईवी-एड्स के साथ जीने वाले लोगों को न सिर्फ गंभीर कोविड-19 बीमारी होने का खतरा है, बल्कि कोविड-19 की वजह से उनकी मृत्यु होने का खतरा भी उतना ही अधिक है जितना किसी और अंतर्निहित कारण या बीमारी होने पर है. मौजूदा समय में हुए कई अध्ययनों से पता चलता है कि एआरटी का सख्ती से पालन करने के बावजूद एचआईवी-एड्स वाले लोगों को कोविड-19 बीमारी के खिलाफ किसी तरह की अतिरिक्त सुरक्षा या फायदा नहीं मिलता है.

WHO और सीडीसी की तरफ से जारी किए गए दिशा निर्देश और इस स्टडी के नतीजों का सुझाव है कि एचआईवी-एड्स के साथ जीने वाले लोग जिनकी बीमारी अडवांस स्टेज में पहुंच चुकी है या फिर सही तरीके से नियंत्रित नहीं है उनका इलाज इस तरह से किया जाना चाहिए मानो उन्हें कोविड-19 बीमारी और मृत्यु का खतरा काफी अधिक है. इसका कारण ये है कि सीडीसी का मानना है कि जिन लोगों में अडवांस स्टेज का एचआईवी है उन लोगों में अन्य संक्रमण (विशेष रूप से श्वसन संक्रमण) होने का खतरा अधिक होता है. साथ ही उनमें हाइपरटेंशन और डायबिटीज जैसी अतिरिक्त बीमारियां होने का खतरा भी अधिक होता है. यही कारण है कि कोविड-19 महामारी के दौरान एचआईवी-एड्स वाले लोगों के लिए यही सिफारिश की गई है कि वे एआरटी को जारी रखें ताकि एचआईवी/एड्स को नियंत्रित किया जा सके और साथ ही कोविड-19 संक्रमण के जोखिम को कम करने के लिए खुद को सेल्फ-आइसोलेट करें, क्वारंटीन में रहें, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें, मास्क पहनें और हाथों को नियमित रूप से धोते रहें.

एचआईवी के इलाज और रिसर्च पर कोविड-19 का असर
दुनिया भर के करीब 73 देशों ने पहले ही WHO को बता दिया है कि कोविड-19 महामारी की वजह से उत्पादन और आपूर्ति में व्यवधान आया है जिसकी वजह से एआरटी के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा के स्टॉक से बाहर होने का खतरा है. इनमें से 24 देशों ने एआरटी दवाओं के गंभीर रूप से कमी होने और इन जीवनरक्षक दवाओं की आपूर्ति में बड़ी बाधा होने की सूचना दी है. WHO और UNAIDS ने मई 2020 में ही पूर्वानुमान लगा लिया था कि अगर एचआईवी-एड्स के साथ जीने वाले लोगों को दिए जाने वाले ART थेरेपी में 6 महीने की भी देरी होती है तो एड्स के कारण होने वाली मौतों की संख्या दोगुनी हो जाएगी, विशेष रूप से गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में.

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ये गंभीर भविष्यवाणियां अच्छी नहीं हैं विशेष रूप से भारत जैसे देश के लिए क्योंकि भारत न केवल सबसे अधिक एचआईवी/एड्स के मामलों वाले शीर्ष तीन देशों में से एक है (अन्य दो देश- दक्षिण अफ्रीका और मोजाम्बिक हैं), बल्कि सबसे ज्यादा कोविड-19 के मामलों वाले देशों में भी दूसरे नंबर पर है। एचआईवी-एड्स के मरीजों के जीवन में मौजूद इन दोहरे जोखिमों को कम करने के लिए डॉक्टरों, हेल्थकेयर प्रफेशनल्स, स्वास्थ्य एजेंसियां और नीति निर्धारकों को मिलकर काम करने की जरूरत है और न सिर्फ भारत में बल्कि दुनियाभर में.

अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल कोविड-19 के दौरान एचआईवी-एड्स के मरीज बरतें ये सावधानियां पढ़ें।

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