इंसानी फेफड़े में पाए गए नए किस्म के सेल्स, क्रोनिक लंग्स डिजीज में होती है अहम भूमिका - स्टडी
स्वास्थ्य

इंसानी फेफड़े में पाए गए नए किस्म के सेल्स, क्रोनिक लंग्स डिजीज में होती है अहम भूमिका – स्टडी

फेफड़े संबंधी बीमारियों (Pulmonary Diseases) के बारे में एक नई जानकारी सामने आई है. रिसर्चर्स ने इंसानों के फेफड़े (Lungs) की गहराई में एक ऐसी नई किस्म की कोशिकाओं की खोज की है, जिनका फेफड़े की बीमारियों में अहम भूमिका होती है. रिसर्चर्स ने इन नई कोशिकाओं को पहचानने के लिए इंसानों के फेफड़े के टिशूज का विश्लेषण किया. इन कोशिकाओं को उन्होंने रेस्पिरेटरी एयरवे सेक्रेटोरी सेल्स (RASC-respiratory airway secretory cell) नाम दिया है. ये एयरवे शाखाएं वाली कोशिकाएं फेफड़े की गहराई में ऐल्वीओली संरचना (alveoli structure) के पास होती है, जहां ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का एक्चेंज होता है. रिसर्चर्स ने दर्शाया है कि आएएससीएस (RASC) में स्टेम सेल जैसे गुण होते हैं, जिससे ये उन कोशिकाओं के रीजेनरेशन में सक्षम होते हैं, जो एल्वीओली के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी होते हैं. उन्हें इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि सिगरेट पीने या अन्य तरह की स्मोकिंग से होने वाली क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मनेरी डिजीज (सीओपीडी) आरएएससीएस के रीजेनरेशन के प्रोसेस को बाधित करता है.

इससे ये संकेत मिलता है कि इस रुकावट को रोकना सीओपीडी (COPD) के इलाज का एक अच्छा तरीका हो सकता है. इस स्टडी की निष्कर्ष ‘नेचर’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

क्या कहते हैं जानकार
पल्मेनरी मेडिसिन की इंस्ट्रक्टर और इस स्टडी की फर्स्ट ऑथर मारिया बासिल (Maria Basil) ने बताया कि सीओपीडी एक सीरियस और कॉमन बीमारी है, लेकिन हम अभी भी इससे संबंधित सेलुलर बायोलॉजी पर ध्यान नहीं दे सके कि कुछ रोगियों में ये रोग क्यों और कैसे होता है. ऐसे में इस नई कोशिकाओं की खोज (जो सीओपीडी में क्षतिग्रस्त हो जाती है.) से वाकई नए किस्म का इलाज खोजने में तेजी आ सकती है.

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स्टडी में क्या निकला
सीओपीडी (COPD) में सामान्य तौर पर वायुकोष्ठिकाओं (alveoli) को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाता है. जिससे उनका क्षरण भी शुरू हो जाता है और क्रोनिक इंफ्लेमेशन की स्थिति उत्पन्न होती है. एक अनुमान के अनुसार, दुनियाभर में करीब 30 लाख लोगों की मौत इसी कारण होती है. रोगियों को इलाज के लिए अक्सर स्टेरॉयड एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स दिए जाते हैं या ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है, लेकिन ये इलाज सिर्फ रोग के बढ़ने की गति कम करते हैं न कि उसे रोकते या पहले जैसी स्थिति में लाते हैं.

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लेकिन सीओपीडी को लेकर प्रयोग में एक कठिनाई ये है कि प्रयोगशाला जीव माने जाने वाले चूहों के फेफड़े में इंसानी फेफड़े की ये विशिष्ठता नहीं पाई जाती है. नई स्टडी में रिसर्चर्स ने स्वस्थ्य इंसान से मिले फेफड़े की कोशिकाओं से सैंपल की जीन-एक्टिविटी के परीक्षण के दौरान आरएएससीएस पाए. इसकी पहचान इसलिए भी आसान हो गई कि चूहों में इस प्रकार की कोशिकाएं नहीं पाई जाती है. ये विशिष्ट स्रावी (सीक्रेटारी) वायुकोष्ठिका के पास पाए गए और ये एयरवे की फ्लूइंड लाइंनिंग के लिए जरूरी प्रोटीन बनाते हैं.

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