आयोडीन की इस कमी को पूरा करने के लिए आयोडी से फॉर्टिफाइड नमक को सप्लिमेंट के तौर पर लेना जरूरी है.
स्वास्थ्य

आयोडीन की कमी भारत में चिंता का विषय क्यों है, जानें इसके कारण

आयोडीन (Iodine) की कमी का दिन, जिसे वैश्विक आयोडीन की कमी विकार (आयोडीन डिफिशिएंसी डिसऑर्डर IDD) रोकथाम दिवस के रूप में भी जाना जाता है, हर साल 21 अक्टूबर को आयोजित होता है. इस दिन को सेलिब्रेट करने का उद्देश्य लोगों के बीच आयोडीन- इस सूक्ष्म पोषक तत्व की जरूरत के बारे में जागरुकता फैलाना है. थायराइड सही तरीके से कार्य करे, मस्तिष्क का विकास हो सके और ओवरऑल ग्रोथ भी बनी रहे इन सबके लिए शरीर को आयोडीन की जरूरत होती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि IDD, मस्तिष्क क्षति का सबसे प्रचलित कारण है, बावजूद इसके इसे आसानी से रोका जा सकता है.

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि IDD की समस्या बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो सकती है और बच्चे के अस्तित्व को भी खतरे में डाल सकती है क्योंकि अगर गर्भवती महिला के शरीर में आयोडीन की कमी हो तो स्टिलबर्थ (गर्भ में ही बच्चे का मरना) का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा गर्भ में पल रहे बच्चे में विकास से जुड़ी समस्याएं, बौद्धिक कमी, जन्मजात असामान्यताएं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं.

आयोडीन की कमी पर अपने ग्लोबल डेटाबेस पर आधारित रिपोर्ट में WHO का कहना है कि वैसे तो कई देश ऐसे हैं जिन्होंने आयोडीन युक्त नमक का व्यापक इस्तेमाल कर अपने यहां आयोडीन की कमी की समस्या को दूर करने में सक्षम हो गए हैं, लेकिन 54 देश अब भी ऐसे हैं जहां आयोडीन की कमी देखने को मिलती है. IDD को कंट्रोल करने के लिए प्राथमिक रणनीति के तौर पर वैश्विक नमक आयोडीज़ेशन का काम साल 1993 में शुरू किया गया था और अधिकांश देशों ने इस स्वास्थ्य समस्या पर काबू पाने में सफलता हासिल की.भारत में आयोडीन की कमी का अदृश्य हाथ
इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (IJMR) में साल 2013 में प्रकाशित एक अध्ययन से संकेत मिलता है कि भारत की संपूर्ण आबादी को आईडीडी का खतरा है क्योंकि हमारे यहां की मिट्टी में खनिज के तौर पर आयोडीन की कमी है. परिणामस्वरूप, भारत में उगाए जाने वाले विविध प्रकार के अनाज, दाल, फल, सब्जियां, सूखे मेवे और बीज में पर्याप्त मात्रा में आयोडीन नहीं होता है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप भारत में किस प्रकार का आहार खाते हैं क्योंकि सभी में आयोडीन की मात्रा बेहद कम है और इसलिए आयोडीन की इस कमी को पूरा करने के लिए आयोडी से फॉर्टिफाइड (मजबूत बनाए गए) नमक को सप्लिमेंट के तौर पर लेना जरूरी है.

साल 2012 में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारत में करीब 35 करोड़ लोग ऐसे हैं जो पर्याप्त मात्रा में आयोडीन युक्त नमक का सेवन नहीं करते हैं और इसलिए उन्हें आईडीडी होने का खतरा बना रहता है. अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान समय में, करीब 91% भारतीय घरों में आयोडीन युक्त नमक की पहुंच है, लेकिन उनमें से केवल 71% ही ऐसे हैं जो इसका पर्याप्त मात्रा में सेवन करते हैं. यही वजह है कि साल 2012 तक IDD के राष्ट्रीय प्रसार को 10% से कम करने का भारत का लक्ष्य था, पूरा नहीं हो पाया था.

न्यूट्रिशन इंटरनैशनल, एम्स और इंडियन कोलिएशन फॉर कंट्रोल ऑफ आयोडीन डिफिशिएंसी डिसऑर्डर (ICCIDD)ने मिलकर एक सर्वेक्षण किया जिसके अनुसार, 2018-2019 में आयोडीन युक्त नमक का पर्याप्त मात्रा में सेवन करने वाले भारतीय परिवारों का प्रतिशत बढ़कर 82.1% हो गया. सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि आयोडीन युक्त नमक के बारे में जागरूकता शहरी क्षेत्रों (62.2%) में ग्रामीण क्षेत्रों (50.5%) की तुलना में अधिक है और सर्वे में शामिल अधिकांश प्रतिभागियों ने आयोडीन को लेकर जागरूकता फैलाने में इलेक्ट्रॉनिक मास मीडिया अभियानों को उपयोगी माना.

आयोडीन की कमी (आईडीडी) के गंभीर प्रभाव
वैसे तो ये आंकड़े शाबाशी देने वाले हैं, बावजूद इसके आयोडीन युक्त नमक की अधिक जागरूकता और उपयोग की आवश्यकता भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है. आयोडीन युक्त नमक की अधिक से अधिक व्यापक खपत की आवश्यकता को उजागर करने के साथ-साथ, कई ऐसे अभियान भी चलाने की जरूरत है जिसमें आईडीडी के नकारात्मक प्रभावों को उजागर करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए, खासकर गर्भवती महिलाओं और परिवारों के बीच. आयोडीन की कमी (आईडीडी) के कुछ गंभीर प्रभाव निम्नलिखित हैं जिनसे भारतीय आबादी का अवगत होना जरूरी है :

1. उच्च शिशु मृत्यु दर : WHO का कहना है कि आयोडीन मां और भ्रूण के थायराइड हार्मोन के उत्पादन के लिए आवश्यक है. ये हार्मोन भ्रूण के ग्रोथ और विकास को नियंत्रित करते हैं, इसलिए यदि आयोडीन की गंभीर कमी हो जाती है, तो गर्भ में बच्चे के जीवित रहने की संभावना बहुत कम हो जाती है (स्टिलबर्थ), साथ ही जन्मजात असामान्यताएं भी पैदा हो सकती हैं.

2. गॉयटर : विश्व स्तर पर, लगभग 90% गॉयटर के मामले आयोडीन की कमी के कारण होते हैं. चूंकि आयोडीन की कमी की वजह से आवश्यक थायराइड हार्मोन का उत्पादन कम हो जाता है, यह थायरॉयड ग्रंथि को नुकसान पहुंचाता है और गॉयटर से वृद्धि का कारण बनता है.

3. हाइपोथायरायडिज्म : आयोडीन की कमी हाइपोथायरायडिज्म का भी सबसे आम कारण है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जैसे ही शरीर में आयोडीन का स्तर गिरता है, थायराइड हार्मोन का उत्पादन गंभीर रूप से बिगड़ जाता है जिसकी वजह से लंबे समय तक रहने वाली यह बीमारी हाइपोथायरायडिज्म का विकास होता है.

4. क्रेटेनिज्म : इसे जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म के रूप में भी जाना जाता है, क्रेटेनिज्म जन्म के समय थायरायड ग्रंथि की गंभीर अंडरऐक्टिविटी से जुड़ा है, मुख्यतः गर्भावस्था और भ्रूण के विकास के दौरान आयोडीन की कमी के कारण. क्रेटेनिज्म की वजब से बच्चे का विकास मंद हो जाता है, फीचर्स असामान्य हो जाते हैं या बच्चे में कई तरह के दोष या डिफेक्ट्स भी हो सकते हैं.

5. मानसिक मंदता : आयोडीन की कमी की वजह से अपरिवर्तनीय मस्तिष्क क्षति होती है, जिसके कारण बच्चों में मानसिक मंदता (मेंटल रिटार्डेशन) की समस्या हो सकती है. मानसिक मंदता की वजह से जीवन में बाद के सालों में गंभीर बौद्धिक विकलांगता, सामाजिक अलगाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं.अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल आयोडीन की कमी के बारे में पढ़ें.न्यूज18 पर स्वास्थ्य संबंधी लेख myUpchar.com द्वारा लिखे जाते हैं. सत्यापित स्वास्थ्य संबंधी  खबरों के लिए myUpchar देश का सबसे पहला और बड़ा स्त्रोत है. myUpchar में शोधकर्ता और पत्रकार, डॉक्टरों के साथ मिलकर आपके लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सभी जानकारियां लेकर आते हैं.



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